अच्छा इंसान बता रहे..

नफ़रत करते रहे हमसे जीते जी,
आज हमें यूं देख कर, आँसू क्यूँ बहा रहे? 

और जो पत्थर रखते रहे हमारे राहों में उम्र भर,
आज हमारे कब्र पर यूं चादर क्यूँ चढ़ा रहे? 

ग़ैरों जैसा बरताव करते रहे हमारे साथ हमेशा,
आज मौत पर हमें अपना अज़ीज़ क्यूँ बता रहे? 

हमें नींद ना आए कभी, ऐसी दुआ करने वाले,
हमारी आख़िरी नींद पर यूं होश क्यूँ गवा रहे? 

उम्र भर दूर जाते रहे हमसे,
आज हमारी लाश को बार-बार यूं सीने से क्यूँ लगा रहे? 

ग़ज़ब फ़ितरत है तुम्हारी साहिब,
जब थे कहीं, तब कोसते रहे, 
अब हैं नहीं, तब अच्छा इन्सान बता रहे!

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